माले, मालदीव | 25 जुलाई 2025
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया मालदीव यात्रा ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत की विदेश नीति अब केवल बयानबाज़ी या कूटनीतिक औपचारिकताओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक सटीक रणनीति और धैर्यपूर्ण नेतृत्व का मिश्रण है, जिसकी गूंज न केवल मालदीव बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में सुनी जा रही है।
यह यात्रा महज़ एक राजकीय दौरा नहीं थी, बल्कि यह एक संदेश था—चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच भी भारत की मौजूदगी निर्णायक और भरोसेमंद है। खास बात यह रही कि प्रधानमंत्री मोदी को खुद राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने एयरपोर्ट पर अगवानी दी, जो मालदीव की परंपरा से परे एक विशेष और सार्थक इशारा माना जा रहा है।
सौजन्य:प्रभासाक्षी
इंडिया आउट से इंडिया इन तक का सफर
गौरतलब है कि जब 2023 में मुइज्जू सत्ता में आए थे, तो उन्होंने खुलकर ‘इंडिया आउट’ अभियान का समर्थन किया था और भारतीय सैन्य उपस्थिति पर सवाल उठाए थे। उनके शुरुआती विदेशी दौरे भी भारत के लिए चिंता का कारण बने—पहले तुर्की, फिर UAE और अंततः चीन। तब यह स्पष्ट था कि मालदीव चीन के प्रभाव में खिंचता जा रहा है।
भारत ने इन संकेतों के बावजूद कोई आक्रामक प्रतिक्रिया नहीं दी। उसने “एंगेजमेंट ओवर एस्केलेशन” की नीति अपनाई—यानी संवाद को टकराव से ऊपर रखा। भारतीय सैनिकों को तकनीकी विशेषज्ञों में बदला गया, जिससे मुइज्जू सरकार की संप्रभुता की चिंताओं को शांत किया गया, और विकास परियोजनाओं को बिना प्रचार के आगे बढ़ाया गया।
विकास और विश्वास की नीति
भारत ने न केवल 30 अरब रुपये की आर्थिक सहायता, करेंसी स्वैप और ट्रेजरी बिल के ज़रिए मालदीव की डूबती अर्थव्यवस्था को उबारा, बल्कि हनीमाधु अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट जैसी परियोजनाओं को भी तेज़ी से आगे बढ़ाया। ये परियोजनाएं केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टिकोण से भी अहम हैं। ये चीन समर्थित बंदरगाहों की राजनीति का सशक्त विकल्प पेश करती हैं।
मौजूदा यात्रा के संकेत
प्रधानमंत्री मोदी की मालदीव यात्रा के दौरान कई दृश्य ऐसे थे जो प्रतीकात्मकता से कहीं आगे निकल गए। राष्ट्रपति मुइज्जू का खुद एयरपोर्ट पर स्वागत करना यह बताता है कि इंडिया आउट की नीति से अब एक स्पष्ट यू-टर्न लिया जा चुका है। मालदीव की राजधानी माले में भारत द्वारा बनाए गए रक्षा मंत्रालय भवन पर प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर लगाई गई—यह सिर्फ सॉफ्ट पावर नहीं, बल्कि भरोसे और स्थिरता का प्रतीक भी बन गई है।
भारत की रणनीति: धैर्य, संवाद और विकास
भारत ने दिखाया कि पड़ोसी देशों को धमकाकर नहीं, बल्कि उनकी आवश्यकताओं के अनुसार साथ देकर, लंबे समय तक रिश्तों को मजबूत किया जा सकता है। भारत ने यह स्पष्ट किया है कि वह क्षेत्रीय स्थिरता का वाहक है, न कि वर्चस्व का आकांक्षी।
प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा ना केवल 60 वर्षों के द्विपक्षीय संबंधों का उत्सव है, बल्कि अगले दशकों की रणनीतिक दिशा भी तय करती है। मालदीव, जो हिंद महासागर क्षेत्र की निगरानी और व्यापारिक रास्तों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, उसमें भारत की वैध उपस्थिति अब न केवल बनी हुई है, बल्कि और मजबूत हुई है।
भारतवंशियों का उत्साह और गौरव
प्रधानमंत्री मोदी के आगमन पर माले में रह रहे भारतीय समुदाय ने जबरदस्त उत्साह दिखाया। कोई 27 वर्षों से वहां रह रहा व्यापारी, कोई आंध्र प्रदेश से आया नागरिक, कोई सिविल इंजीनियर—हर किसी ने प्रधानमंत्री से मिलने की खुशी और गर्व को साझा किया। उनके लिए यह केवल प्रधानमंत्री से मिलना नहीं था, बल्कि एक मजबूत भारत की पहचान से जुड़ना भी था।
निष्कर्ष: सॉफ्ट पावर की जीत
मोदी की यह यात्रा बताती है कि भारत अब पड़ोसी देशों से सिर्फ दोस्ती नहीं चाहता, बल्कि साझेदारी की भावना और स्थिरता की नींव पर एक मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व स्थापित करना चाहता है। चीन के कर्ज जाल के विपरीत भारत की ‘निस्वार्थ सहायता’ अब फल दे रही है।
मालदीव ने संदेश दिया है—भारत भरोसेमंद है, और भारत के साथ जुड़ना राष्ट्रीय हित में है। और यह संदेश अब श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश जैसे अन्य पड़ोसी भी गौर से सुन रहे हैं।
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सुझाव: विदेश नीति में भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ रणनीति पर विश्वास कायम रखना ही सबसे बड़ी कूटनीति है — बिना ज़ोर-जबरदस्ती, बिना डराए — सिर्फ साझेदारी से।








