नई दिल्ली | 22 जुलाई 2025 | देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अचानक इस्तीफे ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। सोमवार की सुबह ठीक 00:00 बजे, जब अधिकांश देश नींद में था, तब एक नौ पंक्तियों वाला त्यागपत्र राष्ट्रपति भवन पहुंचा — जिसमें वजह बताई गई, “स्वास्थ्य संबंधी सलाह पर पद छोड़ने का निर्णय”। लेकिन क्या यह केवल स्वास्थ्य का मामला है, या इसके पीछे कुछ अनकहे सियासी तनाव हैं?
स्वास्थ्य कारणों का हवाला, लेकिन सवाल बाकी
धनखड़ ने अपने त्यागपत्र में लिखा कि वह मेडिकल सलाह के बाद पद से हटने का फैसला ले रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सांसदों का आभार जताया, और कहा कि उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति के तौर पर बहुमूल्य लोकतांत्रिक अनुभव उन्हें मिला। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें भारत के वैश्विक उभार का हिस्सा बनने पर गर्व है।
गौरतलब है कि मार्च 2025 में उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था, जब सीने में दर्द और बेचैनी की शिकायत हुई थी। उस समय भी वह बजट सत्र में शामिल नहीं हो सके थे। यह तथ्य निश्चित रूप से उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंताजनक संकेत देता है।
“अगर स्वास्थ्य कारण ही थे, तो एक दिन पहले क्यों नहीं?”
वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों की राय में सिर्फ स्वास्थ्य को कारण मान लेना, पूरी तस्वीर को नहीं दर्शाता। जैसा कि चर्चित विश्लेषक देवेंद्र ने कहा — “अगर स्वास्थ्य ही वजह थी, तो इस्तीफा एक दिन पहले भी दिया जा सकता था।”
इसी सवाल ने राजनीतिक अटकलों को जन्म दिया है।
बंगाल से शुरू हुई तकरार की राजनीति
धनखड़ का राजनीतिक सफर बेहद दिलचस्प रहा है। वह एक प्रसिद्ध वकील और संवैधानिक मामलों के जानकार रहे हैं। लेकिन जब उन्हें पश्चिम बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया गया, तभी से उनकी ममता बनर्जी सरकार के साथ लगातार टकराव की स्थिति बनी रही।
सूत्रों की मानें तो ममता बनर्जी को हमेशा यह विश्वास रहा कि धनखड़ केंद्र सरकार के इशारे पर उन्हें परेशान कर रहे हैं। वह कभी भी व्यक्तिगत तौर पर उन्हें जिम्मेदार नहीं मानती थीं, बल्कि इसे भाजपा की रणनीति का हिस्सा समझती थीं।
राज्यसभा में भी नहीं थमा विवाद
राज्यसभा के सभापति के तौर पर भी धनखड़ का कार्यकाल विवादों से अछूता नहीं रहा। कई सांसदों ने निजी बातचीत में यह आरोप लगाया कि उपराष्ट्रपति बहुत ज्यादा बोलते हैं, सदस्यों को कम मौका देते हैं, और कभी-कभी ऐसी बातें कह जाते हैं जिससे सदस्य अपमानित महसूस करते हैं।
हालांकि, उनके संवैधानिक ज्ञान और वरिष्ठता के कारण, कोई खुलकर उनका विरोध नहीं करता था। लेकिन उनके बोलने के अंदाज़ और स्वतंत्र विचार हमेशा चर्चा में रहते थे।
क्या स्वतंत्रता ही समस्या बन गई?
धनखड़ हमेशा खुले और निर्भीक विचार रखने वाले नेता माने गए हैं। वह सरकार के साथ हों या विरोध में, संविधान और नियमों की कसौटी पर ही फैसले लेते रहे। शायद यही उनका स्वभाव — “किसी की परवाह न करते हुए, खुलकर बोलना” — उन्हें सत्ता के गलियारों में असहज बना गया।
ऐसी आशंकाएं जताई जा रही हैं कि हालिया समय में कुछ मुद्दों पर उनकी राय सरकारी पक्ष से मेल नहीं खा रही थी, और यह दूरी बढ़ती जा रही थी। ऐसे में स्वास्थ्य का हवाला देकर इस्तीफा देना शायद एक सौम्य रास्ता हो सकता है, राजनीतिक असहमति से बाहर निकलने का।
निष्कर्ष: इस्तीफा एक संकेत?
जहां एक ओर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की निजी इच्छा और स्वास्थ्य का सम्मान किया जाना चाहिए, वहीं दूसरी ओर यह भी जरूरी है कि हम उस संकेतों की भाषा को समझें जो भारतीय राजनीति में अकसर “कह कर नहीं, करके” जताई जाती है।
धनखड़ का इस्तीफा हमें एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की स्वतंत्रता को मौन समर्थन मिलता है? या फिर वह भी अंततः राजनीतिक व्याकरण के अधीन हो जाते हैं?
📌 क्या कहती है जनता?
सोशल मीडिया पर कुछ लोग इसे “स्वाभिमानी नेता का सम्मानजनक प्रस्थान” बता रहे हैं, तो कुछ इसे “राजनीतिक असहमति पर पर्दा डालने की कोशिश” कह रहे हैं।
⏳ आने वाले दिन यह बताएंगे कि क्या यह केवल स्वास्थ्य की वजह थी या कोई गहरी सियासी वजह इस इस्तीफे के पीछे छुपी हुई है।


जगदीप धनखड़ का इस्तीफा: स्वास्थ्य कारण या राजनीतिक असहमति की परछाई?">







