भारत और बांग्लादेश के लिए जीवनरेखा मानी जाने वाली ब्रह्मपुत्र नदी आज एक नए अंतरराष्ट्रीय विवाद का केंद्र बन गई है। चीन ने तिब्बत के न्यिंगची में, ब्रह्मपुत्र—जिसे स्थानीय भाषा में यारलुंग ज़ांगबो कहा जाता है—पर दुनिया के सबसे बड़े हाइड्रोपावर डैम का निर्माण शुरू कर दिया है। भारत की चेतावनियों और बांग्लादेश की चिंताओं को दरकिनार कर चीन ने इस परियोजना की आधारशिला रख दी है। सवाल उठता है – यह डैम तकनीकी चमत्कार है या एशिया के लिए भविष्य का जल संकट?
परियोजना की तस्वीर: कितना बड़ा है ये डैम?
चीन के प्रधानमंत्री ली कियांग ने 20 जुलाई को इस मेगा डैम परियोजना की आधारशिला रखी। इसका नाम है मैनलिंग हाइड्रोपावर स्टेशन, जो 167.8 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग 1.2 ट्रिलियन युआन) की लागत से बनाया जा रहा है।
यह परियोजना पांच कैस्केड डैम्स का समूह होगी, जिससे सालाना 300 अरब किलोवाट-घंटे से ज़्यादा बिजली का उत्पादन संभव होगा – जो लगभग 30 करोड़ लोगों की सालाना बिजली जरूरतों को पूरा कर सकता है।
यह डैम तिब्बत के न्यिंगची शहर में बनाया जा रहा है, जो भारत के अरुणाचल प्रदेश से सटा इलाका है – यही सामरिक और पर्यावरणीय चिंता का मुख्य कारण भी है।
भारत और बांग्लादेश की चिंताएँ: क्यों डरा रहा है यह डैम?
1. पानी पर नियंत्रण का खतरा
ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत से निकलती है और भारत के अरुणाचल प्रदेश होते हुए असम और फिर बांग्लादेश में प्रवेश करती है।
यदि चीन इस नदी के बहाव को अपनी जरूरत के अनुसार मोड़ने या नियंत्रित करने लगे, तो इससे बाढ़, सूखा, खेती, और मछली पालन जैसी गतिविधियाँ गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती हैं।
2. सामरिक चिंता
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने इस परियोजना को “टिकिंग वॉटर बम” कहा है। उनका कहना है कि अगर चीन कभी अचानक पानी छोड़ दे, तो सियांग नदी क्षेत्र और वहाँ की जनजातियाँ भयंकर बाढ़ की चपेट में आ सकती हैं।
3. पर्यावरणीय प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि इस परियोजना से पूरे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। यह इलाका पहले से ही भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील है।
2025 की शुरुआत में तिब्बत में आए 7.1 तीव्रता के भूकंप ने 126 जानें ली थीं और इस डैम क्षेत्र की जोखिम क्षमता को उजागर किया था।
चीन का पक्ष: तकनीक से समाधान?
चीन की सरकारी एजेंसी सिन्हुआ का दावा है कि इस परियोजना में पर्यावरणीय सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा गया है। आधिकारिक बयानों में कहा गया है कि भूवैज्ञानिक अध्ययन और तकनीकी प्रगति के आधार पर इस मेगा डैम को सुरक्षित और टिकाऊ बनाया जाएगा।
हालांकि इतिहास बताता है कि चीन की पारदर्शिता और नदी जल प्रबंधन को लेकर अंतरराष्ट्रीय भरोसा बेहद कमजोर है।
भारत की प्रतिक्रिया और रणनीति: जवाब में अपना डैम
भारत ने इस मुद्दे पर कई बार राजनयिक आपत्ति जताई है और कहा है कि वह स्थिति पर नजर बनाए हुए है।
भारत के विदेश मंत्रालय ने जनवरी 2025 में बयान दिया था कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा।
इसके साथ ही, भारत ने ब्रह्मपुत्र की ही एक सहायक नदी सियांग पर अपना डैम बनाने की योजना शुरू कर दी है। अरुणाचल के उपमुख्यमंत्री चोवना मेन ने कहा कि यह परियोजना रणनीतिक और पर्यावरणीय दोनों मोर्चों पर चीन को जवाब देने की एक पहल है।
भारत-चीन जल-साझा प्रणाली: कितनी कारगर?
दोनों देशों के बीच 2006 में स्थापित ‘एक्सपर्ट लेवल मैकेनिज्म (ELM)’ के तहत मानसून के दौरान कुछ जलविज्ञान डेटा साझा किया जाता है।
हालाँकि, विशेषज्ञों की राय है कि यह व्यवस्था अधूरी, अस्थायी और एकतरफा है – चीन जब चाहे जानकारी देना बंद कर सकता है, जैसा उसने 2017 डोकलाम विवाद के समय किया था।
भविष्य की चुनौती: पानी – नया भू-राजनीतिक हथियार?
ब्रह्मपुत्र केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारत, चीन और बांग्लादेश के बीच भू-राजनीतिक संबंधों का अहम आधार बनती जा रही है।
जहाँ भारत जल-संप्रभुता की बात करता है, वहीं चीन ऊपरवर्ती (upstream) देश होने का लाभ उठाते हुए “जल कूटनीति” को एक हथियार बना रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले दशकों में जल संकट ही दुनिया में संघर्षों का सबसे बड़ा कारण बन सकता है – ब्रह्मपुत्र इस संकट का सबसे संवेदनशील उदाहरण बन सकता है।
निष्कर्ष: क्या होना चाहिए भारत का अगला कदम?
चीन का यह कदम केवल एक इंजीनियरिंग परियोजना नहीं, बल्कि भारत और बांग्लादेश के लिए एक चेतावनी है – पानी पर नियंत्रण आज ऊर्जा और पर्यावरण से भी बड़ी सुरक्षा चुनौती बन चुका है।
भारत को चाहिए कि वह:
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कूटनीतिक दबाव बनाए,
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जल नीति में पुनर्गठन करे,
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अपनी डैम परियोजनाओं में तेजी लाए, और
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निचले हिस्से के देशों के साथ साझेदारी कर एक व्यापक ट्रांसबाउंड्री जल समझौता बनाए।
यह डैम हमें याद दिलाता है कि 21वीं सदी के युद्ध बंदूक से नहीं, पानी की धार से लड़े जाएंगे।









