भारतीय राजनीति में गठबंधन की राजनीति हमेशा से अहम रही है। खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में, जहां जातीय समीकरण, धार्मिक आधार और सामाजिक संतुलन चुनाव परिणामों को गहराई से प्रभावित करते हैं। हाल ही में AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी द्वारा राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को गठबंधन के लिए चिट्ठी लिखना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम बन गया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब ओवैसी खुद गठबंधन का प्रस्ताव दे रहे हैं, तो RJD और कांग्रेस क्यों अनिच्छुक दिखाई दे रही हैं?
ओवैसी का प्रस्ताव: एक समीकरण बदलने की कोशिश
असदुद्दीन ओवैसी ने बिहार में मुस्लिम वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए राजद को एक चिट्ठी लिखी, जिसमें उन्होंने 2025 के विधानसभा चुनाव और 2024 के बाद के परिदृश्य में महागठबंधन का विस्तार करने की अपील की। उनका तर्क है कि बिहार के मुस्लिम-दलित और पिछड़ा वर्ग के हितों की रक्षा तभी संभव है जब वे एक साझा मंच पर आएं। ओवैसी खुद को मुस्लिम राजनीति की मजबूत आवाज मानते हैं और AIMIM का सीमांचल क्षेत्र में खासा प्रभाव है।
RJD-कांग्रेस की अनिच्छा: डर और रणनीति
1. मुस्लिम वोटों का बंटवारा

राजद और कांग्रेस का मानना है कि अगर वे ओवैसी के साथ गठबंधन करते हैं तो इससे भाजपा को सीधा फायदा मिल सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ओवैसी का साथ लेने से हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण बढ़ सकता है और भाजपा को इस बात का फायदा मिल सकता है।
महागठबंधन की पारंपरिक रणनीति मुस्लिम मतों को एकजुट रखने की रही है, लेकिन ओवैसी की अलग राजनीतिक शैली से ये मत विभाजित हो सकते हैं।
2. ओवैसी की छवि ‘वोटकटवा’ की
कांग्रेस और राजद दोनों ही ओवैसी को लेकर संदेह की दृष्टि रखते हैं। उन्हें लगता है कि ओवैसी का मकसद भाजपा को फायदा पहुंचाना है, भले ही वे सीधे तौर पर ऐसा न कहें। कई बार चुनावों में AIMIM के उम्मीदवारों ने विपक्षी वोट बैंक को काटकर भाजपा की मदद की है, जिससे उनकी छवि “वोटकटवा” के तौर पर बन गई है।
3. ओवैसी की आक्रामकता और वैचारिक मतभेद
राजद और कांग्रेस का राजनीतिक दृष्टिकोण धार्मिक समावेशिता और सेक्युलरिज्म पर आधारित है, जबकि ओवैसी की राजनीतिक शैली अक्सर धार्मिक मुद्दों को केंद्र में रखती है। इससे वैचारिक टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है, जो गठबंधन की राजनीति के लिए खतरा बन सकता है।
राजनीतिक समीकरण: सीमांचल बनाम बाकी बिहार
बिहार के सीमांचल क्षेत्र – खासकर किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया – में AIMIM ने 2020 के विधानसभा चुनाव में पांच सीटों पर जीत दर्ज कर सबको चौंका दिया था। यह ओवैसी के लिए एक बड़ी कामयाबी थी। लेकिन 2022 में उपचुनावों और दल-बदल के बाद AIMIM का प्रभाव कुछ कम जरूर हुआ, लेकिन इस क्षेत्र में उनकी मौजूदगी अब भी राजनीतिक रूप से अहम है।
राजद नहीं चाहती कि सीमांचल में AIMIM के साथ आकर वह बाकी बिहार में अपने मजबूत जातीय समीकरण को खतरे में डाले। लालू यादव और तेजस्वी यादव की राजनीति यादव-मुस्लिम गठजोड़ पर टिकी है, लेकिन वे यह गठजोड़ अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं, ना कि किसी और के हिस्से में बांटना।
कांग्रेस की स्थिति: खुद ही संकट में
कांग्रेस की स्थिति बिहार में लगातार कमजोर होती जा रही है। पार्टी ने अभी तक गठबंधन की स्पष्ट रणनीति नहीं बनाई है और RJD पर निर्भरता बढ़ा दी है। कांग्रेस को डर है कि AIMIM को साथ लाने से राष्ट्रीय स्तर पर उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि को चोट पहुंच सकती है। पार्टी के पास सीमित संसाधन और संगठनात्मक ढांचे की वजह से वे किसी नई सियासी बहस या विवाद में पड़ना नहीं चाहती।
तेजस्वी यादव की नई राजनीति
तेजस्वी यादव अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए एक नई राजनीति की ओर बढ़ रहे हैं। वे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को केंद्र में लाकर एक सकारात्मक राजनीति की छवि बनाना चाहते हैं। ऐसे में अगर वे ओवैसी के साथ आते हैं, तो उन पर भी धार्मिक ध्रुवीकरण के आरोप लग सकते हैं। इससे नए वोटरों का मोहभंग हो सकता है।
भाजपा की रणनीति: ओवैसी को लेकर चुप्पी
भाजपा ने अब तक इस मसले पर कोई खास टिप्पणी नहीं की है। लेकिन यह स्पष्ट है कि भाजपा को ओवैसी का मैदान में होना सीधा लाभ पहुंचाता है। 2020 में AIMIM की उपस्थिति ने विपक्षी वोट बैंक में सेंध लगाई थी, जिससे कई सीटों पर एनडीए को अप्रत्याशित जीत मिली।
क्या ओवैसी अकेले चुनाव लड़ेंगे?
अगर गठबंधन नहीं होता है, तो ओवैसी सीमांचल और कुछ अन्य सीटों पर अकेले चुनाव लड़ सकते हैं। इससे विपक्षी मतों में फिर बंटवारा हो सकता है। इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा। लेकिन अगर ओवैसी को पर्याप्त समर्थन नहीं मिला, तो यह उनकी राजनीतिक साख के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
निष्कर्ष: गठबंधन की राजनीति और उसके जोखिम
ओवैसी का गठबंधन का प्रस्ताव सैद्धांतिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन राजनीतिक धरातल पर कई जटिलताएं हैं। RJD और कांग्रेस दोनों ही इस गठबंधन से बचना चाहती हैं क्योंकि इससे उनकी राजनीतिक स्थिरता, वोट बैंक और छवि पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, अगर विपक्ष एकजुट नहीं हुआ, तो भाजपा को सीधा लाभ मिल सकता है।
आगामी समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ओवैसी अपने इस प्रस्ताव को लेकर जनता और राजनीतिक दलों पर दबाव बना पाएंगे, या यह चिट्ठी भी महज एक राजनीतिक बयान बनकर रह जाएगी।









