परिचय
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल की पांच देशों की यात्रा—घाना, त्रिनिडाड और टोबैगो, अर्जेंटीना, ब्राजील और नामीबिया—सिर्फ एक साधारण कूटनीतिक यात्रा नहीं है। यह यात्रा भारत की रणनीतिक दृष्टि, वैश्विक भूमिका और दक्षिणी गोलार्ध (ग्लोबल साउथ) के देशों के साथ संबंधों को नई दिशा देने की कोशिश है। भारत के इस कदम ने चीन की चिंता बढ़ा दी है, खासकर अफ्रीकी देशों में भारत की बढ़ती उपस्थिति के कारण। आइए इस यात्रा के महत्व, इसके असर और इससे जुड़े रणनीतिक पहलुओं को विस्तार से समझते हैं।
ग्लोबल साउथ की अवधारणा और भारत की भूमिका
ग्लोबल साउथ शब्द का प्रयोग उन देशों के लिए किया जाता है जो भूगोलिक रूप से दक्षिणी गोलार्ध में स्थित हैं और जिनका आर्थिक विकास तुलनात्मक रूप से धीमा रहा है। इनमें अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के देश शामिल हैं। भारत खुद को इन देशों का नेता मानता है और अंतरराष्ट्रीय मंचों जैसे संयुक्त राष्ट्र व WTO में इनके हितों की आवाज बनकर उभरा है।
भारत की यह यात्रा ग्लोबल साउथ की साझेदारी यानी “South-South Cooperation” को मजबूत करने का प्रतीक है। यह सिर्फ दोस्ती की बात नहीं, बल्कि साझा विकास, तकनीक, व्यापार और शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग की दिशा में एक सशक्त कदम है।
घाना: भारत की रणनीति का पहला पड़ाव
घाना भारत की अफ्रीका नीति में एक प्रमुख कड़ी है। यह पश्चिम अफ्रीका का महत्वपूर्ण देश है जो प्राकृतिक संसाधनों—विशेषकर सोना, बॉक्साइट, कोको और तेल—से समृद्ध है। भारत और घाना के बीच मजबूत व्यापारिक संबंध हैं।

2021 में भारत ने घाना से लगभग 1.37 बिलियन डॉलर का इंपोर्ट किया, जबकि 1.34 बिलियन डॉलर का एक्सपोर्ट किया। यहाँ भारत की कंपनियाँ—Tata, Mahindra, L&T और NIIT—इन्वेस्ट कर रही हैं। प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान घाना में चार MoUs पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें ट्रेड, मैरिटाइम सिक्योरिटी, क्रिटिकल मिनरल्स और आयुर्वेदिक चिकित्सा शामिल रहे।
चीन की चिंता का कारण
चीन पिछले एक दशक में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के माध्यम से अफ्रीकी देशों में भारी निवेश कर चुका है। घाना को चीन से करीब $5 बिलियन डॉलर का कर्ज मिला है। इन कर्जों की शर्तें इतनी कठिन हैं कि उन्हें “ऋण जाल (Debt Trap)” कहा जाता है।
चीन ने घाना में बॉक्साइट खनन के लिए जंगलों के कटाव की योजना बनाई थी, जिससे स्थानीय लोगों और पर्यावरणविदों में आक्रोश फैला। भारत की उपस्थिति अब चीन की इस एकाधिकारवादी रणनीति को चुनौती दे रही है।
अन्य देशों की यात्रा और उनका महत्व
- त्रिनिडाड और टोबैगो: यह कैरिबियाई देश है जहाँ भारतवंशी आबादी का प्रतिशत काफी अधिक है। सांस्कृतिक जुड़ाव के साथ-साथ यहाँ निवेश और व्यापार के अवसर भी हैं।
- अर्जेंटीना: भारत के प्रधानमंत्री 57 साल बाद अर्जेंटीना की यात्रा पर गए। अर्जेंटीना में लिथियम और अन्य महत्वपूर्ण खनिज भंडार हैं, जो भारत की बैटरी निर्माण और ऊर्जा क्षेत्र के लिए अहम हैं।
- ब्राजील: ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का यह स्थान इस समय भारत के लिए खास रहा क्योंकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति पुतिन इसमें शामिल नहीं हो रहे हैं। भारत को विशिष्ट अतिथि के रूप में बुलाया गया, जो उसकी वैश्विक भूमिका को दर्शाता है।
- नामीबिया: यह वही देश है जहाँ से भारत ने चीतों को मंगाया था। भारत और नामीबिया के बीच रक्षा, पर्यावरण और ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएँ हैं।
भारत की रणनीति और वैश्विक संदेश
- भारत ऋण जाल में फँसे देशों को सहयोग का वैकल्पिक रास्ता देता है—निवेश, तकनीकी सहायता और शिक्षा के माध्यम से।
- भारत का मॉडल मित्रवत है: सहयोग, आत्मनिर्भरता और पारदर्शिता पर आधारित।
- भारत का यह संदेश साफ है कि वह विकासशील देशों के साथ खड़ा है, न कि उनके संसाधनों पर कब्जा करने के लिए दौड़ में है।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक ठोस भू-राजनीतिक रणनीति है। भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं बल्कि वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करने वाला देश बनने की दिशा में अग्रसर है। चीन की बेचैनी इस बात का प्रमाण है कि भारत की रणनीति असरदार है। यह यात्रा भारत की उस नीति को दर्शाती है जिसमें साझेदारी को प्राथमिकता दी जाती है, प्रभुत्व को नहीं।
आने वाले समय में यह साफ होता चला जाएगा कि भारत की यह पहल ग्लोबल साउथ के लिए एक नया विकल्प बनकर उभरेगी और भारत को एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में स्थापित करेगी।









