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जवाबी टैरिफ पर भारत-अमेरिका के बीच बातचीत: क्या जल्द सुलझेगा मामला?

डोनाल्ड ट्रंप ट्रेड डील 2025
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Bureau Report

प्रस्तावना:
अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति में ‘जवाबी टैरिफ’ यानी Reciprocal Tariffs आज के समय का एक अहम मुद्दा बन चुका है। खासकर जब अमेरिका जैसे वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे लागू करने की बात करते हैं, तो दुनिया भर के बाजारों में हलचल मच जाती है। हाल ही में ट्रंप प्रशासन ने ऐलान किया कि अमेरिका अब उन देशों पर टैरिफ लगाएगा जो अमेरिकी उत्पादों पर अधिक शुल्क लगाते हैं। इसी कड़ी में भारत और अमेरिका के बीच बातचीत भी अंतिम दौर में पहुँच चुकी है, लेकिन कृषि क्षेत्र की जटिलताओं के चलते अभी भी कुछ पेच फंसे हुए हैं।


1. क्या है ‘जवाबी टैरिफ’ और क्यों बना ये मुद्दा?

‘जवाबी टैरिफ’ का मतलब है—अगर कोई देश अमेरिका के निर्यात पर ज्यादा शुल्क लगाता है, तो अमेरिका भी उसी अनुपात में उस देश के उत्पादों पर टैरिफ लगाएगा। इसका उद्देश्य है व्यापार में संतुलन और निष्पक्षता बनाए रखना।

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डोनाल्ड ट्रंप ने अप्रैल 2025 में ऐलान किया था कि अमेरिका रेसिप्रोकल टैरिफ पॉलिसी को लागू करेगा और सभी देशों के साथ फेयर ट्रेड डील्स की कोशिश की जाएगी। इसके लिए उन्होंने दो महीने की मोहलत (डेडलाइन: 9 जुलाई) दी थी, ताकि देशों के साथ बातचीत कर कोई समाधान निकाला जा सके।


2. भारत-अमेरिका ट्रेड डील: कहां अटकी बात?

डोनाल्ड ट्रंप ट्रेड डील 2025

भारत और अमेरिका दोनों इस मुद्दे पर लंबे समय से बातचीत कर रहे हैं। हालांकि कई क्षेत्रों में सहमति बन चुकी है, लेकिन एग्रीकल्चर सेक्टर (कृषि व्यापार) एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ बातचीत में गतिरोध बना हुआ है। अमेरिका चाहता है कि भारत अपने कृषि बाजार को अमेरिकी उत्पादों के लिए अधिक खोलें, जबकि भारत अपने किसानों की सुरक्षा और घरेलू उत्पादकों की प्रतिस्पर्धा को लेकर सतर्क है।

कुछ प्रमुख मुद्दे:

  • दूध और डेयरी उत्पाद: अमेरिका चाहता है कि भारत उसके डेयरी उत्पादों पर कम टैरिफ लगाए, जबकि भारत धार्मिक और सांस्कृतिक आधार पर कुछ सीमाएं बनाए रखना चाहता है।
  • फसल सब्सिडी: भारत के कृषि उत्पादों पर दी जाने वाली सब्सिडी को लेकर भी अमेरिका आपत्ति जताता है।

3. वियतनाम और ब्रिटेन के साथ अमेरिका की डील बन चुकी है

जहाँ भारत के साथ बातचीत अभी भी जारी है, वहीं अमेरिका पहले ही वियतनाम और ब्रिटेन के साथ सफल ट्रेड डील्स कर चुका है। इन समझौतों में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के टैरिफ को लेकर सहमति बनाई है, जिससे इन देशों के लिए अमेरिकी बाजार अधिक सुगम हो गया है। इससे भारत पर भी दबाव बना है कि वह अमेरिका के साथ जल्द से जल्द कोई करार करे।


4. समय सीमा और अमेरिकी रुख: बढ़ती है उम्मीद या चिंता?

डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि जिन देशों के साथ समझौता नहीं होगा, उन्हें एक औपचारिक पत्र भेजा जाएगा, जिसमें बताया जाएगा कि उन पर अमेरिका जवाबी टैरिफ लगाएगा। यह पत्र 9 जुलाई 2025 के बाद भेजे जाने शुरू हो सकते हैं।

भारत की स्थिति:
भारत ने आशा जताई है कि ट्रेड डील जल्दी ही हो जाएगी, और डोनाल्ड ट्रंप की टिप्पणियों से भी यही संकेत मिलते हैं कि वह भारत को व्यापारिक भागीदार मानते हैं। लेकिन यदि डील नहीं होती, तो भारत पर टैरिफ बढ़ने का जोखिम है, जिससे भारतीय निर्यातकों को नुकसान हो सकता है।


5. वैश्विक बाजार पर प्रभाव: सेंटीमेंट और रणनीति

जवाबी टैरिफ की संभावनाओं ने वैश्विक व्यापारिक माहौल में अस्थिरता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत और अमेरिका जैसे बड़े देशों के बीच व्यापार टकराव बढ़ता है, तो:

  • निर्यात प्रभावित हो सकता है
  • बाजार में अनिश्चितता का माहौल बनेगा
  • विदेशी निवेश पर असर पड़ेगा

वहीं, अगर डील हो जाती है तो यह भारत की वैश्विक छवि को मजबूती देगा और दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ेगा।


निष्कर्ष: क्या आगे का रास्ता साफ है?

जवाबी टैरिफ को लेकर भारत और अमेरिका के बीच चल रही बातचीत इस समय बेहद निर्णायक मोड़ पर है। जहां अमेरिका स्पष्ट संकेत दे चुका है कि वह देरी नहीं करेगा, वहीं भारत भी दबाव में आकर लेकिन संतुलन बनाकर समझौता करने की कोशिश में है।

अगर डील हो जाती है, तो यह दोनों देशों के लिए विन-विन सिचुएशन होगी। लेकिन अगर बात नहीं बनी, तो भारत को अमेरिकी बाजार में महंगे शुल्क का सामना करना पड़ सकता है।

आगामी कुछ दिन बेहद अहम हैं, और 9 जुलाई की डेडलाइन से पहले कोई बड़ी घोषणा संभव है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत और दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका कैसे अपने व्यापारिक मतभेदों को सुलझाते हैं।

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