परिचय: मानसून में गरज संसद में!
भारतीय लोकतंत्र का मंदिर कही जाने वाली संसद इस बार फिर गर्म है — और इस बार वजह है ‘ऑपरेशन सिंदूर’। यह पहला संसद सत्र है जब भारतीय सेना की एक बड़ी सैन्य कार्रवाई के बाद सभी दल संसद में आमने-सामने हैं। सत्ता पक्ष इसे ‘रणनीतिक जीत’ मानकर विजय उत्सव के रूप में देखना चाहता है, जबकि विपक्ष इसे “नरेंद्र सरेंडर” करार देकर सवाल खड़ा कर रहा है।
इस मानसून सत्र की शुरुआत से ही जो दृश्य सामने आए हैं — वो संसद की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। क्या वाकई विपक्ष को बोलने नहीं दिया जा रहा? क्या सरकार जवाब देने को तैयार है? या दोनों पक्ष सिर्फ एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं? आइए विस्तार से समझते हैं।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर विवाद: सर्जिकल स्ट्राइक या रणनीतिक असफलता?
‘ऑपरेशन सिंदूर’ भारतीय सेना द्वारा पहलगाम क्षेत्र में आतंकियों के खिलाफ की गई एक महत्त्वपूर्ण सैन्य कार्रवाई थी। सरकार का दावा है कि इस ऑपरेशन में पाकिस्तान और उसके आतंकी संगठनों को गहरी चोट दी गई — ड्रोन सिस्टम्स, एयरबेस, और लॉन्च पैड्स नष्ट किए गए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद सत्र से ठीक पहले मीडिया को संबोधित करते हुए अपील की:
“हम सब मिलकर डिफेंस के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बल दें। एक स्वर में सेना के सामर्थ्य की सराहना करें।”
लेकिन विपक्ष ने इसे राजनीतिक प्रचार बताया। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने संसद में इस ऑपरेशन पर गहराई से चर्चा की मांग की — साथ ही यह आरोप लगाया कि सरकार सिर्फ अपनी बात रखती है, विपक्ष को बोलने नहीं देती।
संसद में हंगामा: चर्चा से बचना या चर्चा से हावी होना?
सत्र के पहले ही दिन सदन का दृश्य कुछ यूं था:
- कांग्रेस और सहयोगी दल वेल में आकर नारेबाज़ी करते रहे।
- रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, जेपी नड्डा, और लोकसभा स्पीकर ने बार-बार सदन की कार्यवाही शांतिपूर्वक चलाने की अपील की।
- सरकार ने कहा कि वह “हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है”, लेकिन विपक्ष की शर्तें (जैसे पीएम की मौजूदगी) टकराव की वजह बनीं।
विपक्ष का तर्क था कि:
“अगर सरकार के मंत्री बोल सकते हैं, तो विपक्ष के नेताओं को भी उतनी ही जगह मिलनी चाहिए।”
जबकि सत्ता पक्ष का आरोप था कि विपक्ष जानबूझकर चर्चा से बच रहा है और सिर्फ राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है।
राहुल गांधी बनाम हकीकत: क्या उन्हें बोलने नहीं दिया गया?
राहुल गांधी का यह बयान कि “मुझे बोलने ही नहीं दिया जाता है” खुद ही विवाद का केंद्र बन गया।
विरोधाभास देखिए — खड़गे साहब, जो राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं, वही संसद में खड़े होकर सरकार से सवाल कर रहे थे। यानी विपक्ष को पूरी तरह से चुप नहीं किया गया था।
सवाल यह भी है कि जब विपक्ष बार-बार हंगामा करता है, नारेबाज़ी करता है और स्पीकर की बात नहीं सुनता, तो फिर कैसे संसद में “सार्थक चर्चा” हो?
सरकार की रणनीति: ‘माहौल बनाओ’, विपक्ष को घेरो?
यह सत्र सिर्फ चर्चा के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक संकेत देने के लिए भी बेहद अहम है:
- पीएम मोदी ने साफ तौर पर कहा कि विपक्ष को देशहित में “एक मन” होकर सोचना चाहिए।
- उन्होंने यह भी कहा कि यह सत्र कई अहम विधेयकों और नीतिगत फैसलों के लिए प्रस्तावित है।
लेकिन सूत्र बताते हैं कि सरकार इस सत्र में कुछ ‘बड़ा और चौंकाने वाला’ करने की तैयारी में भी है। इसका ऐलान कब और कैसे होगा, यह फिलहाल रहस्य बना हुआ है।
ट्रंप और अंतरराष्ट्रीय बयानबाज़ी: भ्रम या बाहरी समर्थन?
खड़गे ने संसद में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हवाले से यह भी कहा कि:
“ट्रंप ने 24 बार कहा कि उनकी मध्यस्थता से युद्ध रुका।”
यहां सवाल उठता है — क्या भारत जैसे संप्रभु राष्ट्र को विदेशी नेताओं की बातों का आधार बनाकर संसद में बहस करनी चाहिए? क्या यह हमारी विदेश नीति और आत्मनिर्भर सैन्य रणनीति का अपमान नहीं?
लोकतंत्र का संकट: संसद या सोशल मीडिया का युद्धक्षेत्र?
आज की राजनीति में एक बड़ा बदलाव यह है कि बहस अब संसद से ज्यादा सोशल मीडिया पर हो रही है। नेता संसद में बोलने से ज्यादा ट्विटर, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर “कट-कट” वीडियो डालने में रुचि रखते हैं।
सुशांत सिन्हा जैसे पत्रकारों ने भी इस मुद्दे पर सवाल उठाए कि:
“क्या सोशल मीडिया के लिए संसद का नाटक हो रहा है?”
यह गहन प्रश्न है, जो यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं ‘वायरल’ संस्कृति की बलि चढ़ रही हैं?
निष्कर्ष: मुद्दों से ध्यान हटता देश — कौन ज़िम्मेदार?
संसद का काम होता है बहस, विमर्श और नीति निर्माण। अगर वहां सिर्फ हंगामा हो, तो जनता का विश्वास टूटता है।
सरकार अगर वाकई चर्चा चाहती है, तो उसे विपक्ष को समुचित मंच देना होगा।
विपक्ष अगर गंभीर है, तो उसे संसद के अंदर रहकर संवैधानिक तरीकों से सवाल उठाने होंगे, न कि सड़क की तरह वेल में उतरकर।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी सैन्य कार्रवाई सिर्फ राजनीति का विषय नहीं — राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है। इसमें एक स्वर जरूरी है, ताकि आतंकियों और उनके आका को स्पष्ट संदेश जाए कि भारत एकजुट है।
आपकी बारी: क्या संसद जनता की उम्मीदों पर खरे उतर रही है?
इस लेख के अंत में, यह सवाल आपके लिए छोड़ते हैं —
क्या आप मानते हैं कि संसद में हो रहे हंगामे से मुद्दों पर चर्चा रुक रही है? क्या सरकार और विपक्ष दोनों को आत्ममंथन की जरूरत नहीं है?
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संसद का मानसून सत्र और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर सियासी घमासान: हंगामे में गुम होती लोकतंत्र की आवाज़">







