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ढाई लाख महंगी हाइब्रिड कारें: दिल्ली के खरीदार क्यों बढ़ा रहे हैं पड़ोसी राज्यों की ओर रुख?

हाइब्रिड कारें दिल्ली
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Bureau Report

परिचय: हाइब्रिड कारें और दिल्ली में बढ़ती कीमतों का असर

दिल्ली, देश की राजधानी होने के साथ-साथ एक प्रमुख ऑटोमोबाइल बाजार भी है। खासकर जब बात हो इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों की, तो दिल्ली सरकार की नीतियों और सब्सिडी मॉडल का सीधा असर उपभोक्ताओं के फैसलों पर पड़ता है।

हाल ही में दिल्ली सरकार द्वारा हाइब्रिड कारों पर मिलने वाली रजिस्ट्रेशन छूट को खत्म कर दिया गया, जिससे इन कारों की कीमत अचानक ₹2.5 लाख तक बढ़ गई। इसका परिणाम यह हुआ कि दिल्ली के उपभोक्ता अब उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान जैसे पड़ोसी राज्यों की ओर रुख कर रहे हैं, जहां हाइब्रिड कारें अपेक्षाकृत सस्ती मिल रही हैं।

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क्या है हाइब्रिड कार और क्यों है यह विकल्प आकर्षक?

हाइब्रिड कारें दिल्ली

हाइब्रिड कारें दो ऊर्जा स्रोतों – पेट्रोल (या डीज़ल) और बैटरी (इलेक्ट्रिक मोटर) पर चलती हैं। इसका फायदा यह होता है कि:

  • वाहन की फ्यूल एफिशिएंसी (माइलेज) बढ़ जाती है।

  • प्रदूषण कम होता है क्योंकि यह कम पेट्रोल-डीज़ल जलाती है।

  • शहरों में स्मूद ड्राइविंग अनुभव मिलता है।

भारत में टोयोटा इनोवा हाईक्रॉस, टोयोटा अर्बन क्रूज़र हाइराइडर, मारुति ग्रैंड विटारा, होंडा सिटी ई:एचईवी जैसी हाइब्रिड कारें लोगों की पसंद बन रही हैं।


दिल्ली में क्यों बढ़ी हाइब्रिड कारों की कीमतें?

दिल्ली सरकार ने हाल तक हाइब्रिड कारों को इलेक्ट्रिक वाहनों की श्रेणी में रखते हुए रजिस्ट्रेशन टैक्स पर छूट दी थी।

लेकिन हाल ही में एक नीतिगत बदलाव के तहत:

  • हाइब्रिड वाहनों से EV जैसी छूट वापस ले ली गई।

  • अब दिल्ली में हाइब्रिड कारों पर 7% तक रजिस्ट्रेशन टैक्स देना होगा।

  • इसके चलते ₹15–20 लाख की हाइब्रिड कार अब लगभग ₹2.5 लाख तक महंगी हो गई है।

यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब हाइब्रिड वाहन भारत में एक व्यवहारिक संक्रमण विकल्प माने जा रहे थे — पूरी तरह EV पर जाने से पहले।


पड़ोसी राज्यों की स्थिति: क्या है अंतर?

जहां दिल्ली सरकार ने छूट हटाई, वहीं हरियाणा, उत्तर प्रदेश, चंडीगढ़ और राजस्थान जैसे राज्यों में अभी भी हाइब्रिड कारों पर या तो कम रजिस्ट्रेशन शुल्क लिया जा रहा है या फिर EV श्रेणी की छूट दी जा रही है।

राज्यवार तुलना (लगभग अनुमान):

राज्य हाइब्रिड कार पर रजिस्ट्रेशन टैक्स संभावित अतिरिक्त लागत (₹)
दिल्ली 7% ₹2.5 लाख तक
हरियाणा 3% ₹1 लाख तक
उत्तर प्रदेश 4% ₹1.2 लाख तक
राजस्थान 2.5% ₹75,000 तक

खरीदारों की बदलती रणनीति: दूसरे राज्यों में पंजीकरण क्यों करवा रहे हैं?

दिल्ली में रहने वाले लोग अब अपनी हाइब्रिड कारों को नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद, या जयपुर से खरीदकर वहीं रजिस्टर करवा रहे हैं

कारण साफ हैं:

  1. ₹2–2.5 लाख तक की बचत सीधे रजिस्ट्रेशन पर।

  2. कई डीलर्स अब इंटर-स्टेट सेल और रजिस्ट्रेशन पैकेज की सुविधा दे रहे हैं।

  3. दिल्ली-एनसीआर की सीमा से सटे शहरों में ड्राइविंग और सेवा की कोई असुविधा नहीं

हालांकि, तकनीकी तौर पर यदि व्यक्ति दिल्ली में रहता है तो उसे दिल्ली में ही वाहन रजिस्टर करवाना चाहिए, लेकिन यह प्रावधान कई बार नरम अनुपालन में आ जाता है।


ऑटो इंडस्ट्री की प्रतिक्रिया: सरकार के फैसले पर सवाल

टोयोटा, होंडा और मारुति सुज़ुकी जैसे प्रमुख वाहन निर्माताओं ने दिल्ली सरकार के इस निर्णय पर चिंता व्यक्त की है

टोयोटा किर्लोस्कर मोटर के एक प्रवक्ता ने कहा:

“हम उम्मीद करते हैं कि हाइब्रिड जैसे ग्रीन टेक्नोलॉजी को EV के समान बढ़ावा मिलना चाहिए। यह निर्णय उपभोक्ताओं को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है।”

उद्योग जगत का मानना है कि हाइब्रिड कारें लंबी दूरी के लिए व्यावहारिक समाधान हैं और उन्हें EV जैसी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।


सरकार की दलील: हाइब्रिड को पूरी तरह EV नहीं मान सकते

दिल्ली सरकार के अधिकारियों का तर्क है कि चूंकि हाइब्रिड वाहन पूरी तरह बैटरी से नहीं चलते, इसलिए उन्हें EV के समान लाभ देना पर्यावरणीय दृष्टि से उचित नहीं है।

वे चाहते हैं कि उपभोक्ता सीधे इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ें, जिससे कार्बन उत्सर्जन में वास्तविक कमी आए।


निष्कर्ष: संतुलन की ज़रूरत

हाइब्रिड कारें भारत जैसे देश के लिए ट्रांजिशन टेक्नोलॉजी हैं, जो पेट्रोल-डीज़ल से EV की ओर बढ़ने में सहायक हो सकती हैं। लेकिन जब नीतिगत अस्थिरता आती है, तो उपभोक्ता भ्रमित होता है और इंडस्ट्री को भी नुकसान होता है।

दिल्ली सरकार का रुख पर्यावरण के पक्ष में है, लेकिन यह भी ज़रूरी है कि कार खरीदारों की आर्थिक व्यवहार्यता और तकनीकी व्यावहारिकता को भी समझा जाए।

यदि सरकारें पूरे देश में समान नीति अपनाएं और हाइब्रिड व EV दोनों को बढ़ावा दें, तो भारत का ऑटो सेक्टर न सिर्फ़ पर्यावरण-अनुकूल बन सकता है, बल्कि उपभोक्ता भी बेहतर विकल्प चुन पाएंगे — बिना किसी वित्तीय असमानता के।

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